खयाल

आज यूँ ही मैं निकला फिरसे घूमने , वही अपने दोस्तों के साथ, मैं टहल ही रहा था बेफिक्र होकर , तभी नज़र पड़ी एक बच्चे पे, था वह करीब 9-10 साल का , उसके कपड़े बयाँ कर रहे थे उसकी गरीबी का आलम, हाथों में थे उसके 15-20 गुब्बारे , पर उन गुब्बारों को पाकर भी उसके चेहरे पर वो खुशी वह संतुष्टि नहीं थी जो एक आम बच्चे के चेहरे पर होती है, शायद इसीलिए क्योंकि वह ज़िम्मेदारियों से घिरा हुआ था, ज़िम्मेदारी गुब्बारे बेचकर कुछ पैसे कमाने की, ज़िम्मेदारी गुब्बारे बेचकर ज़िन्दगी चलाने की, ज़िम्मेदारी कुछ पैसे कमाकर एक और दिन बिताने की, इन्हीं ज़िम्मेदारियों ने उन गुब्बारों को इतना वजनी बना दिया था , और उसका बचपन कहीं गुमा दिया था, था वो बिलकुल अकेला शायद उसके माँ-बाप नहीं थे या शायद थे या शायद होकर भी नहीं थे , मैं यह सब सोच ही रहा था कि तभी मेरे दोस्त ने उस बच्चे को 10 रुपये दे दिए , वह पैसे पाकर उसके चेहरे पर एक अलग खुशी उजागर हो उठी ,जो शायद हमारे चेहरे पर तब होती है जब हमे कोई महँगा तोहफा मिलता है , उसके बाद वो वहां से चला गया , पर मेरे ज़ेहन में एक सवाल सा रह गया, सवाल कुछ ऐसा की कबतक ये बच्चे यूँ ही सड़कों पर भटकते रहेंगे , कबतक ये यूँ ही गुब्बारे बेचकर ज़िंदा रहेंगे , कबतक गरीबी इनके चेहरे से इनकी मुस्कान और मासूमियत को यूँ ही छीनती रहेगी , क्या यही इनकी किस्मत है , क्या यही इनकी ज़िन्दगी है , और इन्ही सवालों को अपने ज़ेहन में लिए मैं चला आया……..।। —-अभिनव मिश्र

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